तुम्हे देखता हूँ जब पास से मैं,
कुछ एक सांस लेता हूँ विश्वास से मैं.
समंदर समंदर कहाँ तक चलूँगा,
तन्हा यूं रात भर कहाँ तक जलूँगा.
यूं शीशों से बचकर,
यूं भीड़ों में छुपकर,
मैं अपने ही मन को कहाँ तक छलूँगा.
बहुत थक गया हूँ इस आभास से मैं,
तुम्हे देखता हूँ जब पास से मैं !!
हर एक दर्द दिल में छुपाये छुपाये,
कोई जिंदगी को कहाँ तक चुकाए,
हर एक शाम धुंधली,
हर एक रात काली,
सितारे भी होते हैं कितने पराये.
बहुत मिल गया हूँ आकाश से मैं,
तुम्हे देखता हूँ जब पास से मैं !!!!
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Taken from the blog of Raj ji
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