Friday, February 20, 2015

क्यूंकि घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..

घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..

और देखी हैं चारपाई एक सिरे से बुनती हुईं..

एक चिड़िया जो रोज मेरी थाली के पास बैठने आती थी हर सुबह..

और मैं रोटी के छोटे छोटे टुकड़े उसकी तरफ फेंकता था..

एक सीढ़ी छोड़ के एक सीढ़ी चढ़ना उस दौर की मेरी एक उपलब्धि थी..

और अब मैं दूसरों के यहां टीवी देखने भी नहीं जाता था..

गाँव का तालाब हरा था..आसमान झक्क नीला था..

मैं दिन भर खाट पर लेटे लेटे

सूरज की किरणों को बादलों से पार निकलते देखता था..

सफ़ेद रुई से बादल..

जिनमे शाम होते ही शायद लालटेन जल जातीं थीं

और वो लाल रंग के होने लगते थे...

शाम भर मैं पतंगों को पेंच लड़ाते हुए देखता था..

पर मेरा घर ऐसी जगह था जिधर की हवा कभी नहीं चलती थी..

पतंगे कट के मेरी छत से होके नहीं जाती थीं..

पतंगों के बीच दिखते थे वी शेप में उड़ते हुए पछी..

तेज तेज पंख फड़फड़ाते कबूतर..

और स्लो मोशन में पख फैला के उड़ती हुई चीलें..

उस दौर में बन्दर भी गैंग बना कर आते थे..

किसी घर से कटोरी उठाई किसी से कपडे..

और फिर वो फिरौती में खाना मांगते थे...

बड़े अच्छे से रिश्ते थे..

लगता था मानो समाज हम सब से ही मिलके बना हुआ है..

धरती सिर्फ इंसानों की नहीं हैं..

पर सब कुछ बिखर सा गया एक आंधी में...

जैसे फेयर वर्क न होके रफ वर्क हो...

क्यूंकि घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..

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