Friday, February 20, 2015

वो वाला मैं भी चला गया..

कई दिनों तक मैं वहीँ खड़ा रहा...

इंतज़ार करता रहा..

रोया नहीं.... हंसा नहीं...

तुम्हारे लौट आने की उम्मीद में..

उसी शर्ट में जिसमे तुम्हे मैं सबसे अच्छा लगता था...

दिल मानने को तैयार ही नहीं था..

की तुम नहीं लौटोगी..

आज जब 5 साल बाद...

इस पार्टी में अचानक से सामने आ गयी हो तो...

ऐसे घबरा कर मुझे ना देखो...

इस शर्ट का कलर वही है....

लेकिन ये शर्ट वो नहीं है..

जो तुमने कभी मुझे गिफ्ट की थी...

सुनो ओ..

जिसे छोड़ के तुम भी चली गयीं थी...

वो वाला मैं भी चला गया..

क्यूंकि घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..

घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..

और देखी हैं चारपाई एक सिरे से बुनती हुईं..

एक चिड़िया जो रोज मेरी थाली के पास बैठने आती थी हर सुबह..

और मैं रोटी के छोटे छोटे टुकड़े उसकी तरफ फेंकता था..

एक सीढ़ी छोड़ के एक सीढ़ी चढ़ना उस दौर की मेरी एक उपलब्धि थी..

और अब मैं दूसरों के यहां टीवी देखने भी नहीं जाता था..

गाँव का तालाब हरा था..आसमान झक्क नीला था..

मैं दिन भर खाट पर लेटे लेटे

सूरज की किरणों को बादलों से पार निकलते देखता था..

सफ़ेद रुई से बादल..

जिनमे शाम होते ही शायद लालटेन जल जातीं थीं

और वो लाल रंग के होने लगते थे...

शाम भर मैं पतंगों को पेंच लड़ाते हुए देखता था..

पर मेरा घर ऐसी जगह था जिधर की हवा कभी नहीं चलती थी..

पतंगे कट के मेरी छत से होके नहीं जाती थीं..

पतंगों के बीच दिखते थे वी शेप में उड़ते हुए पछी..

तेज तेज पंख फड़फड़ाते कबूतर..

और स्लो मोशन में पख फैला के उड़ती हुई चीलें..

उस दौर में बन्दर भी गैंग बना कर आते थे..

किसी घर से कटोरी उठाई किसी से कपडे..

और फिर वो फिरौती में खाना मांगते थे...

बड़े अच्छे से रिश्ते थे..

लगता था मानो समाज हम सब से ही मिलके बना हुआ है..

धरती सिर्फ इंसानों की नहीं हैं..

पर सब कुछ बिखर सा गया एक आंधी में...

जैसे फेयर वर्क न होके रफ वर्क हो...

क्यूंकि घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..

क्यूंकि हार कर जीतने वाले की साइकिल अक्सर २० मीटर पीछे ही चलती है

रोज जब तू स्कूल से छुट्टी में घर निकलती है,
तेरी साइकिल से २० मीटर पीछे मेरी साइकिल चलती है,
और जब तू पीछे मुड़ के देख लेती है तो में अक्सर झेंप जाता हूँ.
फिर जोर से पैडल मार के साइकिल से आगे निकल जाता हूँ,
तिराहे पर जाके जब ढीली चैन उतरती है,
साइकिल की रफ़्तार धीमी और दिल की धड़कन चढ़ती है,
मैं साइकिल कच्चे में उतार लेता हूँ,
झूठ मूट की हताशा निराशा ठेलता हूँ,
फिर तेरे आगे निकलते ही
मैं उलटे पेडल मारके चैन चढ़ा लेता हूँ,
हमेशा की तरह तेरी गली से २० मीटर पहले मेरी साइकिल रूकती है,
क्यूंकि हार कर जीतने वाले की साइकिल अक्सर २० मीटर पीछे ही चलती है