कई दिनों तक मैं वहीँ खड़ा रहा...
इंतज़ार करता रहा..
रोया नहीं.... हंसा नहीं...
तुम्हारे लौट आने की उम्मीद में..
उसी शर्ट में जिसमे तुम्हे मैं सबसे अच्छा लगता था...
दिल मानने को तैयार ही नहीं था..
की तुम नहीं लौटोगी..
आज जब 5 साल बाद...
इस पार्टी में अचानक से सामने आ गयी हो तो...
ऐसे घबरा कर मुझे ना देखो...
इस शर्ट का कलर वही है....
लेकिन ये शर्ट वो नहीं है..
जो तुमने कभी मुझे गिफ्ट की थी...
सुनो ओ..
जिसे छोड़ के तुम भी चली गयीं थी...
वो वाला मैं भी चला गया..
Abhishek K. Pandey - Pandeyji Online
My Blog My Life...........
Friday, February 20, 2015
वो वाला मैं भी चला गया..
क्यूंकि घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..
घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..
और देखी हैं चारपाई एक सिरे से बुनती हुईं..
एक चिड़िया जो रोज मेरी थाली के पास बैठने आती थी हर सुबह..
और मैं रोटी के छोटे छोटे टुकड़े उसकी तरफ फेंकता था..
एक सीढ़ी छोड़ के एक सीढ़ी चढ़ना उस दौर की मेरी एक उपलब्धि थी..
और अब मैं दूसरों के यहां टीवी देखने भी नहीं जाता था..
गाँव का तालाब हरा था..आसमान झक्क नीला था..
मैं दिन भर खाट पर लेटे लेटे
सूरज की किरणों को बादलों से पार निकलते देखता था..
सफ़ेद रुई से बादल..
जिनमे शाम होते ही शायद लालटेन जल जातीं थीं
और वो लाल रंग के होने लगते थे...
शाम भर मैं पतंगों को पेंच लड़ाते हुए देखता था..
पर मेरा घर ऐसी जगह था जिधर की हवा कभी नहीं चलती थी..
पतंगे कट के मेरी छत से होके नहीं जाती थीं..
पतंगों के बीच दिखते थे वी शेप में उड़ते हुए पछी..
तेज तेज पंख फड़फड़ाते कबूतर..
और स्लो मोशन में पख फैला के उड़ती हुई चीलें..
उस दौर में बन्दर भी गैंग बना कर आते थे..
किसी घर से कटोरी उठाई किसी से कपडे..
और फिर वो फिरौती में खाना मांगते थे...
बड़े अच्छे से रिश्ते थे..
लगता था मानो समाज हम सब से ही मिलके बना हुआ है..
धरती सिर्फ इंसानों की नहीं हैं..
पर सब कुछ बिखर सा गया एक आंधी में...
जैसे फेयर वर्क न होके रफ वर्क हो...
क्यूंकि घर के छज्जे तक बंटते देखे हैं मैंने..
क्यूंकि हार कर जीतने वाले की साइकिल अक्सर २० मीटर पीछे ही चलती है
रोज जब तू स्कूल से छुट्टी में घर निकलती है,
तेरी साइकिल से २० मीटर पीछे मेरी साइकिल चलती है,
और जब तू पीछे मुड़ के देख लेती है तो में अक्सर झेंप जाता हूँ.
फिर जोर से पैडल मार के साइकिल से आगे निकल जाता हूँ,
तिराहे पर जाके जब ढीली चैन उतरती है,
साइकिल की रफ़्तार धीमी और दिल की धड़कन चढ़ती है,
मैं साइकिल कच्चे में उतार लेता हूँ,
झूठ मूट की हताशा निराशा ठेलता हूँ,
फिर तेरे आगे निकलते ही
मैं उलटे पेडल मारके चैन चढ़ा लेता हूँ,
हमेशा की तरह तेरी गली से २० मीटर पहले मेरी साइकिल रूकती है,
क्यूंकि हार कर जीतने वाले की साइकिल अक्सर २० मीटर पीछे ही चलती है
Thursday, January 22, 2015
क्यों लगाते है छप्पन भोग?
क्यों लगाते है छप्पन भोग?
भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है. इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं जिसे छप्पन भोग कहा जाता है. यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है.
अष्ट पहर भोजन करने वाले बाल कृष्ण
भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं. ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदा जी बाल कृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी, अर्थात बाल कृष्ण आठ बार भोजन करते थे. जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्री कृष्*ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया.
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मईया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्*न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया.
गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों. श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी. व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया.
छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां
ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्*ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं. उस कमल की तीन परतें होती हैं. प्रथम परत में "आठ", दूसरी में "सोलह" और तीसरी में "बत्तीस पंखुड़िया" होती हैं. प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में भगवान विराजते हैं. इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्*पन होती है. 56 संख्या का यही अर्थ है.
छप्पन भोग इस प्रकार है -
1. भक्त (भात), 2. सूप (दाल), 3. प्रलेह (चटनी), 4. सदिका (कढ़ी), 5. दधिशाकजा (दही शाक की कढ़ी), 6. सिखरिणी (सिखरन), 7. अवलेह (शरबत), 8. बालका (बाटी), 9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा), 10. त्रिकोण (शर्करा युक्त), 11. बटक (बड़ा), 12. मधु शीर्षक (मठरी), 13. फेणिका (फेनी), 14. परिष्टïश्च (पूरी), 15. शतपत्र (खजला), 16. सधिद्रक (घेवर), 17. चक्राम (मालपुआ), 18. चिल्डिका (चोला), 19. सुधाकुंडलिका (जलेबी), 20. धृतपूर (मेसू), 21. वायुपूर (रसगुल्ला), 22. चन्द्रकला (पगी हुई), 23. दधि (महारायता), 24. स्थूली (थूली), 25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी), 26. खंड मंडल (खुरमा), 27. गोधूम (दलिया), 28. परिखा, 29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त), 30. दधिरूप (बिलसारू), 31. मोदक (लड्डïू), 32. शाक (साग), 33. सौधान (अधानौ अचार), 34. मंडका (मोठ), 35. पायस (खीर) 36. दधि (दही), 37. गोघृत, 38. हैयंगपीनम (मक्खन), 39. मंडूरी (मलाई), 40. कूपिका (रबड़ी), 41. पर्पट (पापड़), 42. शक्तिका (सीरा), 43. लसिका (लस्सी), 44. सुवत, 45. संघाय (मोहन), 46. सुफला (सुपारी), 47. सिता (इलायची), 48. फल, 49. तांबूल, 50. मोहन भोग, 51. लवण, 52. कषाय, 53. मधुर, 54. तिक्त, 55. कटु, 56. अम्ल.
Tuesday, January 20, 2015
The Best Way to End The Day: 5 Things to Do Before You Go to Sleep
Source: The Best Way to End The Day: 5 Things to Do Before You Go to Sleep
You know that moment between going to bed and falling asleep, right?
Some watch movies, read a book, force their eyes to close, plan and worry about tomorrow, or think about the things they had to do today but didn’t manage to.
I say eliminate all this and make the best of the end of the day.
It’s a period of time that’s important for your personal development whether you realize it or not. It’s as important as the morning routine. A day that’s started well should also end well.
And the way to do it is pretty simple and the benefits are amazing.
Here are 5 things to do before you go to sleep in the evening that will make your day meaningful and will help you live stress-free and more happily:
1. Let go
In order to be ready for the next day with all its opportunities, challenges and surprises, you’ll need to let go of what was today.
Let go of all the things you did, didn’t do, forgot to do, and failed to do. Breathe deeply and let things be as they are now.
Let go of all your disappointments, little arguments, people that annoyed you, doubts, negative thoughts, judging and comparing.
Also, forgive. Forgive all those who insulted you, made you feel bad or didn’t behave the way you expected. Forgive yourself for making mistakes, not being brave enough, missing a chance or not being honest with yourself.
Feel how everything bad and negative is leaving your body, you don’t feel exhausted any more and let in freedom, peace and joy.
2. Accept
Accept yourself for who you are, and things the way they turned out to be. Understand that everything is perfect just the way it is and things are just fine.
You don’t need to worry, plan, take control or fear.
Realize that you did your best.
3. Be optimistic
Look forward to tomorrow. But don’t plan it in details so that you don’t fall into the trap of trying to control events too much.
Just be sure that the next day is going to be amazing and new and exciting things are waiting for you.
4. Be grateful
Thank for this day. It’s a gift.
Appreciate all the chances you had, the nice meals, the opportunity to be with your loved ones, to be in your comfortable place and do things you love. Not everyone has all this. Notice it and be grateful.
5. Go to sleep in peace
Look around in the darkness. Breathe deeply a couple of times. Hear the silence, empty your mind and concentrate on your breathing.
It’s a kind of a meditative state. Your body is at ease, you have no thoughts, needs and desires to distract you. You feel great right now. And nothing needs to change.
This is the best way to end your days – no matter how bad or good they were.
If you practice that, it will soon become a habit. And your life will become simpler, easier, more pleasant and joyful.
There’s no other feeling like being able to leave all that burden each night and not carry it with you in the next day. It’s freedom. And wisdom. And happiness.
Sunday, November 30, 2014
Are You a Terrible Boss?
They say that nobody leaves a job; they leave a boss. The way an employee is managed on a daily basis has a huge impact on the way they work, the quality of their work and the amount of work they produce. More seriously, it may even have a negative impact on their health – a recent study showed that people with bad bosses are 30% more likely to suffer heart problems. If they are unlucky enough to have a bad boss, all of those things will suffer. In addition, bad bosses have a negative impact on the business’s bottom line – if an employee leaves because of their boss, it costs about £25,000 to replace them.
If you manage a team that is under-performing or making a lot of mistakes, have you considered that you might be part of the problem? You might think you’re a good boss, but they might think you’re a terrible boss. Here’s how you can tell if your management characteristics are in line with those generally cited by employees to be possessed by terrible bosses.
Non-existent or poor communication
If a boss doesn’t communicate what he wants or expects from his team in terms of deadlines, end results and so on, they end up having to guess, which can often lead to things going wrong. In addition, a company that isn’t open and transparent with employees about its direction, profits and processes can lose good employees who want to be fully aware of the way in which their employer operates.
No long-term planning or vision
Bosses have to promote a long-term plan for the company or for their individual teams in order to allow employees to become positively invested in the organisation’s mission. After all, if there are no obvious goals to aim for, what do employees have to look forward to with regard to coming into work every day?
No recognition for a job well done
In a similar vein, the best way to engage employees and increase the quality and productivity of their work is to ensure that their achievements are recognised and rewarded. Bad bosses ignore employees until they make a mistake and something goes wrong, which is when they pounce on them. If a good employee thinks that he or she will only be noticed when they do the wrong thing, they will leave.
No approachability
As senior members of staff, bosses need to be approachable when they are in the office. There might be questions about projects that need clarification, problems that need dealing with or other decisions that cannot be made by a non-senior person, and it slows down processes and tasks if employees do not feel as though they can bring something that requires attentions to their boss.
If these characteristics ring a bell with you, do not worry: help is at hand. This infographic by Thales L&D defines the seven traits of the ultimate leader, combining the styles of a managerial leader and a visionary leader, both of which have their positives but ultimately aren’t effective as management styles adopted on their own. With the help of the infographic, you should be able to correct the way in which you lead, bringing out the best in your motivated, happy team and ensuring that the business has a secure footing on which to move forward.
Monday, November 17, 2014
33 Koti Devi Devata
अधूरा ज्ञान खतरना होता है।
33 करोड नहीँ 33 कोटि देवी देवता हैँ हिँदू
धर्म मेँ। कोटि = प्रकार। देवभाषा संस्कृत में
कोटि के दो अर्थ होते है, कोटि का मतलब
प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़
भी होता। हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के
लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33
करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू
खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़
देवी देवता हैं........
कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मेँ:
12 प्रकार हैँ आदित्य: , धाता, मित, आर्यमा,
शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,
सविता, तवास्था, और विष्णु...! 8 प्रकार हैँ
वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष
और प्रभाष। 11 प्रकार हैँ- रुद्र: ,हर,
बहुरुप,त्रयँबक,
अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली। एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।
कुल: 12+8+11+2=33
Mahabharat
पाँच पाण्डव तथा सौ कौरवों के नाम ये थे :–
पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
1. युधिष्ठिर
2. भीम
3. अर्जुन
4. नकुल
5. सहदेव
( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण
भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु
उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )
यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त
पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव
की माता माद्री थी ।
वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन
2. दुःशासन
3. दुःसह
4. दुःशल
5. जलसंघ
6. सम
7. सह
8. विंद
9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष
11. सुबाहु
12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण
14. दुर्मुख
15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण
17. शल
18. सत्वान
19. सुलोचन
20. चित्र
21. उपचित्र
22. चित्राक्ष
23. चारुचित्र
24. शरासन
25. दुर्मद
26. दुर्विगाह
27. विवित्सु
28. विकटानन्द
29. ऊर्णनाभ
30. सुनाभ
31. नन्द
32. उपनन्द
33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा
35. सुवर्मा
36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु
38. महाबाहु
39. चित्रांग
40. चित्रकुण्डल
41. भीमवेग
42. भीमबल
43. बालाकि
44. बलवर्धन
45. उग्रायुध
46. सुषेण
47. कुण्डधर
48. महोदर
49. चित्रायुध
50. निषंगी
51. पाशी
52. वृन्दारक
53. दृढ़वर्मा
54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति
56. अनूदर
57. दढ़संघ
58. जरासंघ
59. सत्यसंघ
60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा
62. उग्रसेन
63. सेनानी
64. दुष्पराजय
65. अपराजित
66. कुण्डशायी
67. विशालाक्ष
68. दुराधर
69. दृढ़हस्त
70. सुहस्त
71. वातवेग
72. सुवर्च
73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी
75. नागदत्त
76. उग्रशायी
77. कवचि
78. क्रथन
79. कुण्डी
80. भीमविक्र
81. धनुर्धर
82. वीरबाहु
83. अलोलुप
84. अभय
85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय
87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी
89. विरवि
90. चित्रकुण्डल
91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि
93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान
95. दीर्घबाहु
96. सुजात
97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी
99. विरज
100. युयुत्सु
( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहन
भी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,
जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )
"श्री मद्-भगवत गीता"
के बारे में-
किसको किसने सुनाई?
उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।
कब सुनाई?
उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।
भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
उ.- रविवार के दिन।
कोनसी तिथि को?
उ.- एकादशी
कहा सुनाई?
उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।
कितनी देर में सुनाई?
उ.- लगभग 45 मिनट में
क्यू सुनाई?
उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।
कितने अध्याय है?
उ.- कुल 18 अध्याय
कितने श्लोक है?
उ.- 700 श्लोक
गीता में क्या-क्या बताया गया है?
उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।
गीता को अर्जुन के अलावा
और किन किन लोगो ने सुना?
उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने
अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?
उ.- भगवान सूर्यदेव को
गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उ.- उपनिषदों में
गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?
उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।
गीता का दूसरा नाम क्या है?
उ.- गीतोपनिषद
गीता का सार क्या है?
उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना
गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
उ.- श्रीकृष्ण ने- 574
अर्जुन ने- 85
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40
Tuesday, November 11, 2014
राधा-कृष्ण
स्वर्ग में विचरण
करते हुए
अचानक एक दुसरे के
सामने आ गए
विचलित से
कृष्ण ,
प्रसन्नचित सी
राधा...
कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई
इससे पहले कृष्ण
कुछ कहते
राधा बोल उठी
"कैसे हो द्वारकाधीश ?"
जो राधा उन्हें
कान्हा कान्हा
कह के बुलाती थी
उसके मुख से
द्वारकाधीश का
संबोधन
कृष्ण को
भीतर तक
घायल
कर गया
फिर भी किसी तरह
अपने आप को
संभाल लिया
.....और बोले राधा से
मै तो तुम्हारे लिए
आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश
मत कहो!
आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो
सच कहूँ राधा
जब जब भी
तुम्हारी याद
आती थी
इन आँखों से
आँसुओं की बुँदे
निकल आती थी
बोली राधा ,मेरे साथ
ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई
ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे
कभी भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते
इन आँखों में सदा
तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के
साथ निकल
ना जाओ
इसलिए रोते भी
नहीं थे
प्रेम के अलग होने पर
तुमने क्या खोया
इसका इक आइना
दिखाऊं आपको ?
कुछ कडवे सच ,
प्रश्न सुन पाओ तो
सुनाऊ?
कभी सोचा इस
तरक्की में तुम
कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी
से जिंदगी शुरू की
और समुन्द्र के
खारे पानी तक
पहुच गए ?
एक ऊँगली पर
चलने वाले
सुदर्शन चक्र
पर भरोसा कर लिया
और दसों उँगलियों
पर चलने वाळी
बांसुरी को
भूल गए ?
कान्हा जब तुम
प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली
गोवर्धन पर्वत
उठाकर लोगों को
विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने
पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग
दिखाने लगी
सुदर्शन चक्र
उठाकर विनाश के
काम आने लगी
कान्हा और
द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है
बताऊँ
कान्हा होते तो
तुम सुदामा के
घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर
नहीं आता
युद्ध में और प्रेम
में यही तो फर्क
होता है
युद्ध में आप मिटाकर
जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर
जीतते हैं
कान्हा प्रेम में
डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को
दुःख नहीं देता
आप तो कई
कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ
के दाता हो
पर आपने
क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना
कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको
पांडवों के
साथ कर लिया
सेना तो आपकी
प्रजा थी
राजा तो पालक होता है
उसका रक्षक होता है
आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को
चला रहा था
जिस पर बैठा
अर्जुन
आपकी प्रजा को ही
मार रहा था
आपनी प्रजा को
मरते देख
आपमें करूणा
नहीं जगी
क्यूंकि आप
प्रेम से शून्य
हो चुके थे
आज भी धरती
पर जाकर देखो
अपनी
द्वारकाधीश
वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही
खड़े नजर आओगे
��
आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान
की बात करते हैं
उनके महत्व की
बात करते है
मगर धरती के लोग
युद्ध वाले
द्वारकाधीश.
पर नहीं
प्रेम वाले कान्हा
पर भरोसा करते हैं
गीता में मेरा
दूर दूर तक नाम
भी नहीं है
पर आज भी लोग
उसके समापन पर
" राधे राधे" करते है
Sunday, November 2, 2014
भगवान् राम और चाँद
।। एक सुंदर कविता ।।
चाँद को भगवान् राम से यह शिकायत है की दीपवली का त्यौहार अमावस की रात में मनाया जाता है और क्योंकि अमावस की रात में चाँद निकलता ही नहीं है इसलिए वह कभी भी दीपावली मना नहीं सकता। यह एक मधुर कविता है कि चाँद किस प्रकार खुद को राम के हर कार्य से जोड़ लेता है और फिर राम से शिकायत करता है और राम भी उस की बात से सहमत हो कर उसे वरदान दे बैठते हैं ......
आइये देखते हैं :-
जब चाँद का धीरज छूट गया ।
वह रघुनन्दन से रूठ गया ।
बोला रात को आलोकित हम ही ने करा है ।
स्वयं शिव ने हमें अपने सिर पे धरा है ।
तुमने भी तो उपयोग किया हमारा है ।
हमारी ही चांदनी में सिया को निहारा है ।
सीता के रूप को हम ही ने सँभारा है ।
चाँद के तुल्य उनका मुखड़ा निखारा है ।
जिस वक़्त याद में सीता की ,
तुम चुपके - चुपके रोते थे ।
उस वक़्त तुम्हारे संग में बस ,
हम ही जागते होते थे ।
संजीवनी लाऊंगा ,
लखन को बचाऊंगा ,.
हनुमान ने तुम्हे कर तो दिया आश्वश्त
मगर अपनी चांदनी बिखरा कर,
मार्ग मैंने ही किया था प्रशस्त ।
तुमने हनुमान को गले से लगाया ।
मगर हमारा कहीं नाम भी न आया ।
रावण की मृत्यु से मैं भी प्रसन्न था ।
तुम्हारी विजय से प्रफुल्लित मन था ।
मैंने भी आकाश से था पृथ्वी पर झाँका ।
गगन के सितारों को करीने से टांका ।
सभी ने तुम्हारा विजयोत्सव मनाया।
सारे नगर को दुल्हन सा सजाया ।
इस अवसर पर तुमने सभी को बुलाया ।
बताओ मुझे फिर क्यों तुमने भुलाया ।
क्यों तुमने अपना विजयोत्सव
अमावस्या की रात को मनाया ?
अगर तुम अपना उत्सव किसी और दिन मनाते ।
आधे अधूरे ही सही हम भी शामिल हो जाते ।
मुझे सताते हैं , चिड़ाते हैं लोग ।
आज भी दिवाली अमावस में ही मनाते हैं लोग ।
तो राम ने कहा, क्यों व्यर्थ में घबराता है ?
जो कुछ खोता है वही तो पाता है ।
जा तुझे अब लोग न सतायेंगे ।
आज से सब तेरा मान ही बढाएंगेr r ।
जो मुझे राम कहते थे वही ,
आज से रामचंद्र कह कर बुलायेंगे ।
जय श्री राम...!!!