Sunday, June 1, 2014

कुछ शेर-ओ-शायरी

अजब लुत्फ़ आ रहा था, दीदार ऐ दिल्लगी का,
नज़रे भी हम पे और परदा भी हमसे

------------------------------------------

कोई तावीज़ ऐसा दो की मैं चालाक जाऊं,
बहुत तकलीफ देती है मुझे ये सादगी मेरी

--------------------------------------------

मुझे इतनी
फुर्सत कहाँ कि
मैं तक़दीर का लिखा देखूं;
बस ..
लोगों का
दिल जलता देख कर
समझ जाता हूँ, ..
कि मेरी तक़दीर बुलंद है .. !!!---------------------------------------------------------------

इसी से जान गया मैं कि वक़्त ढलने लगे;
 मैं थक के छाँव में बैठा और पाँव चलने लगे;
 मैं दे रहा था सहारे तो एक हजूम में था;
 जो गिर पड़ा तो सभी रास्ता बदलने लगे।

------------------------------------------------------------------

कब तक होश संभाले कोई, होश उड़े तो उड़ जाने दो;
 दिल कब सीधी राह चला है, राह मुड़े तो मुड़ जाने दो।

------------------------------------------------------------------

ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं, और साल गुज़रते चले जा रहे हैं....!!

--------------------------------------------------------------------

कितनी ही खूबसूरत क्यों न हो तुम
पर मैं जानता हूँ
असली निखार मेरी तारीफ से ही आता है...

---------------------------------------------------------------

खवाहिश नही मुझे मशहुर होने की..
 आप मुझे पहचानते हो बस इतना ही काफी है।
 अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मुझे।
 क्यों की जीसकी जीतनी जरुरत थी उसने उतना ही पहचाना मुझे।
 ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी कितना अजीब है,
 शामें कटती नहीं, और साल गुज़रते चले जा रहे हैं....!!
 एक अजीब सी दौड़ है ये ज़िन्दगी,
 जीत जाओ तो कई अपने पीछे छूट जाते हैं,
 और हार जाओ तो अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं।

1 comment:

  1. इसी से जान गया मैं कि वक़्त ढलने लगे;
    मैं थक के छाँव में बैठा और पाँव चलने लगे;

    ये किनकी शायरी है

    ReplyDelete

Please give your comments !!